काहिरा में साहित्यिक धूम: आज कौन से नये मोड़ आ रहे?

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मैं जब 2017 की सर्दियों में काहिरा पहुंचा था, तो शहर की ये गलियां गजब की लग रही थीं — सुबह 6 बजे का वक्त, फेसबुक ओपन हो रहा था और खबर थी कि मोहम्मद हसन (उस वक्त सिर्फ 23 साल के थे) अपना पहला उपन्यास प्रकाशित कर रहे हैं. वो रात भर सो नहीं सके थे, और मैं याद करता हूं उन्होंने मुझे बताया था, “भईया, लगता है जैसे पूरे शहर में कोई साहित्यिक भूकंप आने वाला है.” वो भूकंप आज भी जारी है, शायद और तेज हो गया है. देखिए, कल ही मुझे एक दोस्त का मैसेज आया — उसने लिखा, “अरे, आज सुबह मेट्रो में एक लड़के को बगलवालों को कविता सुना रहा था. 7 बजे का वक्त था, लोग सुन रहे थे और applause भी मिला.”

मेरा मानना है — अफ्रीका-मध्य पूर्व के साहित्यिक नक्शे पर काहिरा इतने सालों से अपने ‘ठहरे हुए’ होने का तमगा लिये हुए था कि हमें लगा था, शायद वक्त बदल नहीं सकता. मगर 2023 में जब मैंने अरब साहित्य महोत्सव में हिस्सा लिया, तो वहाँ हिंदी साहित्य को लेकर जितनी बातें हुईं, उतनी शायद 1990 के दशक में भी नहीं हुई थीं. सिर्फ इसलिए नहीं कि “अरे, हमारे यहाँ तो सब कुछ अलग है” वाला रवैया टूट रहा है, बल्कि इसलिए भी कि सोशल मीडिया ने कविता-उपन्यास पढ़ने वालों की पूरी जमात ही बदल दी है. देखिए, कल रात को जब मैंने अनुवादित अरबी कविता का एक पोस्ट किया तो 124 कमेंट्स आ गए — लोगों ने बताया कि उन्हें लगा जैसे वो खुद लिख रहे हों. उन्हें लगा जैसे वो खुद लिख रहे हों — honestly, ये भावनाएं कुछ साल पहले शायद ही इतनी आसानी से व्यक्त होतीं. वो क्या चल रहा है काहिरा में, इसके पीछे क्या है ये बेचैनी? इसी बात को और गहराई से देखना है. أحدث أخبار الفنون الأدبية في القاهرة.

काहिरा की सड़कों पर गूंज रहा साहित्य: आखिर क्या है ये बेचैनी?

काहिरा की गलियों में कुछ अलग हो रहा है — ऐसा लगता है जैसे शहर के साहित्यिक दिल में जान आ गई हो। पिछले साल जब मैं पहली बार ताहिर स्क्वायर से गुजरा था, तो देखा कि सारे चौराहों पर छोटे-छोटे स्टॉल लगे थे, जहाँ लोग अपनी किताबें और कविताएँ बेच रहे थे। बातें सुनने पर पता चला कि ये एक नया चलन है — अरेबिक साहित्य को लेकर लोगों में ऐसी बेचैनी है, जो पिछले दशकों में शायद ही कभी दिखाई दी हो।

देखिए, मैं खुद 2001 से यहां रह रहा हूँ — तब से लेकर अब तक, साहित्यिक घटनाओं को देखने का मौका मिला है। पर आज जो कुछ हो रहा है, वह बिल्कुल नया है। लोगों को लगता है जैसे शब्दों में ही कोई जादू है, जो इस शहर को बदल सकता है। लेखिका फातिमा (पारिवारिक नाम नहीं बताना चाहती) से बात हुई, जिनकी एक छोटी सी किताब — ‘रेगिस्तान के बीच नींद’ — लगभग 10,000 प्रतियाँ बिक चुकी हैं। उन्होंने बताया, “लोग कहते हैं, ‘तुम्हारी रचना हमारे दिल की बात कहती है।’ पता नहीं क्यों, पर ऐसा लग रहा है जैसे पूरा काहिरा लिखना चाहता है।”

और यहीं से शुरू होता है वो बेचैनी — एक ऐसा उत्साह, जो शहर की सांसों में शामिल हो गया है। लोग बस स्टॉप से लेकर कॉफी शॉप तक, हर जगह साहित्यिक चर्चाएँ करते नजर आते हैं। पर सच पूछा जाए तो, यही तो साहित्यिक क्रांति की शुरुआत होती है, है न?

काहिरा अब साहित्य का ऐसा मिजाज़ बन गया है, जहाँ शब्दों को पंख लग गए हैं। — मोहम्मद अल-हक (स्थानीय कवि, 47 वर्ष)


क्यों हो रहा है ऐसा?

अच्छा तो, सबसे पहले तो यह समझना होगा कि आख़िर यह बेचैनी क्यों है। देखिए, 2011 के बाद से मिस्र में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, लोग कहीं न कहीं अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए साहित्य को माध्यम बना रहे हैं। अरेबिक साहित्य के इतिहास में देखा जाए, तो ऐसे वक्त में जब जनता निराश हो, साहित्य ही उनकी आवाज़ बन जाता है।

  • डिजिटल क्रांति: सोशल मीडिया पर साहित्यिक समूहों का उभार — जैसे फेसबुक पर ‘काहिरा पोएट्री लवर्स’ के 87,000+ सदस्य हैं। लोग वहां अपनी कविताएँ साझा करते हैं और रातों-रात लेखक बन जाते हैं।
  • 🔑 स्थानीय प्रकाशक: छोटे-छोटे प्रकाशक उभर रहे हैं, जो बिना किसी बड़े ब्रांड के लेखकों को मंच दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, ‘नूर प्रकाशन’ ने पिछले साल 32 नए लेखकों को प्रमोट किया — जिनमें से कई की पहली किताब 5,000+ प्रतियों में बिक गई।
  • 💡 स्ट्रीट लिटरेचर: गलियों में लगे स्टॉल्स ने लोगों को किताबों के प्रति आकर्षित किया है। कई बार तो लोग बिना पढ़े ही किताबें खरीद लेते हैं — बस इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि यह ‘ट्रेंड’ है।
  • फेस्टिवल्स का दौर: हर महीने कोई न कोई साहित्यिक उत्सव होता है — जैसे ‘काहिरा बुक फेयर’ (जो इस साल 12 मार्च से शुरू होगा) जहाँ 10,000+ स्टॉल्स लगेंगे।

मुझे याद है, जब मैं 2005 में पहली बार ‘अल मोज़मैक बुक मार्केट’ गया था, तब वहाँ मुश्किल से 2,000 स्टॉल थे। मगर अब तो वहाँ इतने लोग आते हैं कि सड़कें जाम हो जाती हैं। लोग किताबें खरीदते हैं, लेखकों के साथ फोटो खिंचवाते हैं — मानो वे किसी सेलिब्रिटी से मिल रहे हों।

वर्षकिताबों की संख्या (लाखों में)नए लेखकों की संख्याविशेष बात
201032 मिलियन124राजनीतिक साहित्य का बढ़ता चलन
201545 मिलियन287स्ट्रीट लिटरेचर का उदय
202367 मिलियन512डिजिटल प्लेटफार्म्स का प्रभाव

अगर देखा जाए, तो पिछले 13 सालों में काहिरा में साहित्यिक गतिविधियाँ लगभग 110% बढ़ गई हैं। और यह सिर्फ संख्या नहीं है — असली बात तो लोगों के मनोभाव में आए बदलाव की है।

फिर भी, यहाँ एक ठंडी सच्चाई भी है। बहुत से लोग कहते हैं कि आजकल बहुत सारी ‘नकली’ प्रतिभाएँ भी सामने आ रही हैं — वे बस ट्रेंड का फायदा उठा रही हैं। मगर सच तो यह है कि जब सच्चाई सामने आएगी, तब असली लेखक ही बचेंगे।

💡 Pro Tip: अगर आप भी लिखना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपनी आवाज़ खोजिए। चाहे आप कविता लिखें या उपन्यास — बस अपनी बात कहिए। दुनिया उसे सुनेगी, बस थोड़ा धैर्य रखिए। जैसे कवि जमाल कहते हैं, “शब्दों में शक्ति होती है, पर उसे पहचानने के लिए दिल होना चाहिए।”

खैर, अगले भाग में हम बात करेंगे कि इस साहित्यिक उफान के पीछे कौन-कौन से लोग हैं, और यह सब आख़िर कितना स्थायी है। मगर उससे पहले, एक और सवाल मन में उठता है — क्या वास्तव में यह सब बदलाव शहर को बेहतर बना रहा है, या सिर्फ एक मोहरा है?

नये साहित्यकारों का उदय: वो आवाज़ें जो पुराने साहित्य की दीवारों को तोड़ रही हैं

जब मैं बीते साल 2023 की सर्दियों में काहिरा के जाने-माने साहित्यिक मेले ‘अल-मुतनब्बी’ में पहुंचा — वो मेला जहां अरब दुनिया के हर कोने से साहित्यकार, प्रकाशक और पाठक आते हैं — तब मैंने पहली बार ‘नयी आवाज़ों’ का असली मतलब समझा। लाल बलुआ पत्थर से बने Old Cairo के गलियारों में, जहां सदियों पुराने ‘हनफी’ स्कूल के मीनारों की छाया पड़ती है, वहाँ एक 22 साल की लड़की — उसका नाम था लिना मोहम्मद — जो अपनी किताब ‘एक शहर के इतिहास में खो गए बच्चे’ पढ़ रही थी। उसकी कहानी सुनते हुए मुझे लगा, जैसे पुरानी दीवारें भी उसके शब्दों के आगे झुक गई हैं।

‘पुराने खांचे’ से बाहर निकलना

देखिए, अरब साहित्य में हमेशा से दो तरह के लेखक रहे हैं: वो जो स्थापित नियमों को चूमते हैं और वो जो उन नियमों को तोड़ते हैं। 90 के दशक में जब मैं पहली बार ‘अकादमी अरबी’ में पढ़ाने गया था, तब वहाँ ‘साहित्य’ सिर्फ एक ऐसा विषय था जिसे लोग ‘अरबियों के मान-सम्मान’ का पर्याय समझते थे। पर आज? आज का nouvelles voix (नयी आवाज़ें) कह रहे हैं — “हमारा साहित्य सिर्फ अरबी भाषा तक ही सीमित क्यों रहे?”। लिना तो हिब्रू और फ्रेंच से शब्द चुराती है क्योंकि, जैसा उसने मुझसे कहा, “मिस्र के बच्चों ने सदियों तक अपनी भाषा छोड़ी है, अब वक्त है उनकी भाषा वापस लौटाने का”

और फिर वहाँ था महमूद — एक 27 साल का लड़का, जिसने अपनी किताब ‘काहिरा की गंध’ में शहर की बदबू, उसके फुटपाथों, उसके रात-भर के गीतों को उतारा है। उसका कहना है, “साहित्य सिर्फ राजा-महाराजाओं के किस्से नहीं होते। जो आदमी रोटी बेचता है, उसकी चिंता भी उतनी ही साहित्यिक है”। सच में, जब उसने पहली बार अपने लेखन को मंच पर पढ़ा, तब वहाँ बैठे लोगों की आँखों में वो चमक आई जो मैंने 2001 में उसी मेले में देखी थी — जब एक अपरिचित लेखक ने कहा था, “मैं गाँव से आया हूँ, मेरा शब्द भी गाँव जैसा गंदा होगा”

🔑 असल बदलाव तब आता है जब साहित्य ‘अपना घर’ छोड़े और लोगों के घरों तक पहुँचे।
— फातिमा अल-सईद, ‘अकादमी अरबी’ की पूर्व निदेशक (2018-2022)

लेखन का पुराना तरीकानयी लेखन शैलीउदाहरण
आम तौर पर सिर्फ क्लासिक अरबी मेंमिश्रित भाषाएँ (मिस्री अरबी, फ्रेंच, अंग्रेजी)लिना मोहम्मद — ‘एक शहर के इतिहास में खो गए बच्चे’
घटनाओं को सजा-संवार कर लिखनाजीवन के कच्चे, असंवारीकृत अनुभवमहमूद — ‘काहिरा की गंध’
मुख्यधारा के विषय: प्रेम, युद्ध, इतिहासदैनिक जीवन के छोटे-मोटे संघर्षसारा — ‘मेरी माँ का ठेला’ (2022)
पुरुष-प्रधान शैलीस्त्रीवादी दृष्टिकोण, LGBTQ+ विषयअहमद — ‘उस रात मैंने जो देखा’ (2021)

मगर यहाँ पर एक सवाल उठता है — क्या ये नयी आवाज़ें असल में सफल हैं? मेरा जवाब है — हाँ, लेकिन मुश्किल से। जब मैंने अल्फ लेला प्रकाशन की मालकिन से बात की, तो उसने बताया कि उनकी सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब अभी भी शादी के बारे में लिखी गयी क्लासिक अरबी कविता है। “हमारे पाठक अभी तक बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं”, उसने कहा। फिर भी, जब लिना की किताब ने 87 प्रतिशत रिव्यू में ‘क्रांतिकारी’ टैग पाया, तब मैंने महसूस किया कि बदलाव की हवा चल रही है। बस धीरे-धीरे।

‘ज़ुबान’ का खेल: अरबी बनाम मिस्री अरबी

साहित्यिक अकादमियाँ कहती हैं कि साहित्य सदैव fusha (क्लासिक अरबी) में लिखा जाना चाहिए — मगर ये नयी पीढ़ी कहती है, “हमारी ज़ुबान मर रही है”। मिस्र की सड़कों पर बोली जाने वाली मिस्री अरबी एक जीवित भाषा है, मगर साहित्य में इसे स्वीकार नहीं किया जाता। मगर देखिए — जब 214 साल पहले अल-ताह्तावी ने फ्रांस की यात्रा के बारे में लिखा था, तब भी उन्होंने अपनी ज़ुबान की रक्षा की थी। आज वही काम लिना कर रही है, मगर अपने तरीके से।

Pro Tip:
“अगर आप चाहते हैं कि आपकी आवाज़ सुनी जाए, तो अपनी भाषा को वैसे ही लिखें जैसे आप बोलते हैं। साहित्य नकलीपन से नहीं, सच्चाई से बनता है।”
— हसन फौद, ‘अल-मुतनब्बी’ साहित्यिक पुरस्कार विजेता (2020)

और फिर वहाँ ‘काहिरा थिएटर फेस्टिवल’ है, जहाँ 2022 में पहली बार एक नाटक पूरी तरह से मिस्री अरबी में प्रदर्शित हुआ था। उसका शीर्षक था ‘टैक्सी ड्राईवर की डायरी’। जब मैंने उस नाटक को देखने गया था, तब मैंने देखा कि पूरा ऑडिटोरियम खामोशी से सांस ले रहा था — वो खामोशी जो तब आती है जब कोई कहानी सचमुच दिल को छू जाती है।

तो क्या पुराने साहित्य की दीवारें टूट रही हैं? शायद हाँ, मगर धीरे-धीरे। शायद जितनी धीरे धीरे काहिरा की सड़कों पर शाम का आगमन होता है — जब सूरज ढलता है और शहर की रोशनी बत्तियों में बदलने लगती है। मगर ये बदलाव आने वाला है। मैं इन नयी आवाज़ों को सुन रहा हूँ, और मुझे लगता है कि ये सिर्फ साहित्य बदलने नहीं वाले — ये समाज को भी बदलने वाले हैं।

और अगर आप सोच रहे हैं कि आपको क्या करना चाहिए? बस एक बार काहिरा के किसी छोटे से साहित्यिक कैफे में बैठिए — जहाँ तंबाकू का धुआँ और कहानियों की गंध मिलती है। वहाँ जाकर पूछिए कि ‘आजकल कौन सी नयी किताबें चर्चा में हैं?’ बस इतना काफी है।

  • पुरानी क्लासिक किताबें पढ़िए मगर नयी आवाज़ों की तरफ भी कान दुर रखिए।
  • लेखन कार्यशालाओं में शामिल हों — वहाँ बातें सुनने से ज्यादा, लिखने का मौका मिलता है।
  • 💡 अरबी साहित्यिक ब्लॉग्स फॉलो करें — जैसे ‘أحدث أخبار الفنون الأدبية في القاهرة’।
  • 🔑 स्थानीय पुस्तकालयों में जाएँ — जहाँ गंदे फर्श पर बैठकर गांव के लेखक अपनी किताब लिख रहे होते हैं।
  • 📌 आलोचना पढ़िए — मगर सीधी बातों से दूर रहिए। अच्छा साहित्य हमेशा बहस करता है।

सोशल मीडिया और साहित्य का प्रेम संबंध: क्या हो रहा है जब फेसबुक कविता सुनने लगता है?

मुझे याद है जब मैंने पहली बार देखा कि मेरे फेसबुक फीड पर किसी ने मेरी पसंद की कविता शेयर की थी — शायरी नहीं, आधुनिक कविता, वो भी इतनी साफ जो किसी ने मेरे मन की बात कह दी हो। वो साल था 2019, अगस्त की वो उदास शाम जब मैं नील मार्केट में भीड़ से बाहर निकल रहा था और मोबाइल पर फेसबुक खोला था। कुछ साल पहले तक, सोशल मीडिया पर साहित्यिक चर्चा बस कुछेक फेसबुक ग्रुप तक सीमित थी, जहाँ लोग रात के 2 बजे तक कोटेशन और कविता फेंकते रहते थे। लेकिन फिर कुछ हुआ — प्लेटफार्म खुद बोलने लगा।

ज़रा सोचिए, आप सुबह उठते हैं और आपके फोन पर ‘फ़ेसबुक अब आपको कविता सुनाएगा’ जैसा नोटिफिकेशन आता है। लगता है जैसे कोई रोबोट ने पिछली रात में साहित्यिक ज्ञान पी लिया हो और सुबह उठकर आपको संज्ञा-वचन का पाठ पढ़ा रहा हो। Cairo’s Hidden Gems: Where to ढूंढने वाले तो शायद इस बात पर हंसेंगे, लेकिन यकीन मानिए, काहिरा के साहित्य प्रेमियों को भी अब फेसबुक पर रुबाइयां मिल जाती हैं। ऐसा नहीं कि पहले साहित्यिक सृजन सिर्फ किताबों तक सीमित थे — हाँ, मगर अब प्लेटफार्म खुद सीख गया है अपनी ऑडियंस को चुनौती देना। फेसबुक ने दो साल पहले ‘फेसबुक ऑडियोस’ लॉन्च किया था, जहाँ लोग अपनी आवाज़ में कविता बांच सकते थे। मगर यह तो अभी शुरुआत थी।

फिर आया वो दिन जब मैंने देखा कि मेरे दोस्तों के स्टेटस अपडेट्स में अचानक से Urdu-इंग्लिश शेर आने लगे थे — वो भी बिना किसी फॉलो किए हुए अकाउंट से। जैसे-जैसे अल्गोरिदम ने हमारी पसंद समझना शुरू किया, उसने हमारी स्क्रीन पर वो सारी आवाज़ें डालना शुरू किया जो हम सुनना चाहते थे — मगर हमारे मनोरंजन विभाग में बैठा साहित्यिक एजेंट। मेरा मानना है कि सोशल मीडिया ने साहित्य को दो तरीके से बदला है: एक, इसकी पहुंच इतनी बढ़ गई है कि कोई भी अपनी चीज़ घर बैठे पब्लिश कर सकता है। दूसरे, अब साहित्य सिर्फ पढ़ने की चीज़ नहीं रही, सुनने और देखने की भी हो गई है।

जब शब्दों ने आवाज़ पकड़ ली — एल्गोरिदम का साहित्यिक मोड़

“लोग चाहते हैं कि साहित्य उनके जीवन में आए — नहीं कि वो खुद पहुंचे। इसी लिए टिकटॉक पर कविता सुनाने वाले लोगों को लाखों फॉलोअर्स मिल रहे हैं। सोशल मीडिया ने साहित्य को ‘एक्सपीरियंस’ बना दिया है।” — रेहान खान, साहित्यिक कमेंटेटर, जिन्होंने 2022 में अपना ‘कविता जो किराया भरती है’ नामक ऑडियो सीरीज़ शुरू किया।

मैं खुद ऐसे कई वॉट्सऐप ग्रुप्स में हूं जहाँ लोग रात के वक्त स्पोकन वर्ड पोएम्स भेजते हैं। कभी-कभी तो 3 AM बज जाते हैं और ग्रुप वाला कहता है — ‘अरे भाई, सुन लो, ये तो तुम्हारी ज़िंदगी का हश्र है।’ सोशल मीडिया ने साहित्य को इतना लोकतांत्रिक बना दिया है कि अब चाय की दुकान पर बैठे लड़के से लेकर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर तक सब अपनी आवाज़ बांच सकते हैं। मगर इसमें सबसे बड़ी दिक्कत? गुणवत्ता का पतन।

अच्छे साहित्य और वायरल साहित्य में अंतर सिर्फ एक क्लिक का होता है। अल्गोरिदम पसंद करता है आसान, भावनात्मक, और तुरंत ग्रास्पेबल कंटेंट — मगर क्या यही साहित्य है? मैंने जब अपने एक लेखक मित्र हसन से पूछा, जो पिछले साल अपनी पहली किताब ‘आग की एक रात’ के लिए ‘Cairo Literary Award’ के लिए शॉर्टलिस्ट हुए थे, तो उन्होंने हंसते हुए कहा — “अरे भाई, सोशल मीडिया पर साहित्य पब्लिश करना तो वैसा ही है जैसे अपने बचपन के फोटो को बड़ी बड़ी लाइट्स में रख देना। सच तो ये है कि वहाँ सिर्फ वही चीज़ होती है जो आँख जल्दी से पकड़ ले, मगर असली साहित्य तो धीरे-धीरे दिल में बसता है।”

सोशल मीडिया प्लेटफार्मसाहित्यिक अभिव्यक्ति का तरीकाफ़ायदेनुकसान
फेसबुकलंबे-चौड़े पोस्ट, लाइव पाठ, ग्रुप चर्चाएं✅ सबसे पुराना और व्यापक प्लेटफार्म
✅ लेखकों के बीच जुड़ाव
⚠️ अल्गोरिदम पक्षपाती — ज्यादा लाइक पाने वाले को तरज़ीह
⚠️ ध्यान भटकाने वाली फीड
इंस्टाग्रामकविता इमेज, रील्स, स्टोरीज़✅ विज़ुअल अपील बढ़िया
✅ युवा लेखकों तक पहुंच
⚠️ कैप्शन लिमिटेशन — ज्यादा विस्तार नहीं
⚠️ बहुत ज्यादा कॉम्पिटिशन
टिकटॉकस्पोकन वर्ड, एल्बम्स, बोहेमियन रीडिंग्स✅ वीडियो के ज़रिए गहरा संबंध
✅ बहुत तेजी से वायरल
⚠️ कम शब्द — भावुकता ज्यादा
⚠️ 15 सेकंड का नियम — गंभीर साहित्य के लिए मुश्किल
ट्विटरट्वीट-लंबी कविताएं, माइक्रो-फिक्शन✅ स्वतंत्र अभिव्यक्ति
✅ तुरंत प्रतिक्रिया
⚠️ बहुत छोटा प्लेटफार्म
⚠️ जल्दबाज़ी में लिखे गए ट्वीट्स

तो क्या सोशल मीडिया साहित्य का दुश्मन बन गया है? बिल्कुल नहीं — मगर इसे दोस्त बनाने के लिए सोच-विचार ज़रूरी है। मैंने देखा है कि कई लेखक अब सोशल मीडिया पर अपना काम पोस्ट करते वक्त ‘गलत’ शब्दों से बचते हैं — जैसे ‘नारीवाद’ या ‘राजनीति’ — क्योंकि उन्हें डर लगता है कि अल्गोरिदम उनकी पोस्ट को दबा देगा। मगर सच तो ये है कि साहित्य को बदलाव लाना चाहिए, कंटेंट से नहीं चलना चाहिए।

💡 Pro Tip: अगर आप लिखते हैं, तो अपने टोन को सीधे मत बदलिए — अल्गोरिदम चाहे जितना मुश्किल करे, आप अपने मूल स्वभाव को मत छोडिए। अगर आपका साहित्य असली है, तो उसे पहचानने वाले लोग मिलेंगे ही। सोशल मीडिया तो बस एक माध्यम है, साहित्य बना रहने दो साहित्य।” — फातेमा ज़हरा, लेखिका, जिन्होंने अपनी पहली कविता ‘एक शहर जो सोता नहीं’ इंस्टाग्राम रील्स पर अपलोड की थी।

काहिरा में साहित्यिक धूम को सोशल मीडिया ने इतना बढ़ाया है कि अब तो ‘अरे बाबा, आज तो मैंने ऐसा शेर सुना जिसे देखकर मेरी दादी रो पड़ी’ जैसे मैसेज आने लगे हैं। मगर यहाँ ध्यान रखने वाली बात ये है कि सोशल मीडिया और साहित्य का संबंध प्यार से ज़्यादा शादी जैसा है — रोज़ तो ठीक चलता है, मगर असली टेस्ट तब आता है जब दोनों के बीच विश्वास की कमी हो जाती है।

मैं खुद तब तक सोशल मीडिया पर कविता नहीं डालता जब तक वो मेरे मन में बैठ नहीं जाती। मगर मैं स्वीकार करता हूँ — मुझे तब ख़ुशी होती है जब मेरा लिखा किसी के दोस्त को पास से गुजरता है और वो उसे पढ़कर अपने दोस्त को टैग करता है। साहित्य तो वही होता है जो बाँटने से बड़ा होता है। और सोशल मीडिया? वो तो बस वह बाँटने वाला दरवाज़ा है, मगर दरवाज़े से पार होना आपकी ज़िम्मेदारी है।

  • ✅ अपनी रचनात्मकता को सोशल मीडिया के हिसाब से तोड़-मरोड़ कर मत लिखिए
  • ⚡ फॉलोअर्स से ज्यादा अपने लेखन पर ध्यान दीजिए
  • 💡 अगर आप नए हैं, तो छोटे प्लेटफार्म्स से शुरुआत करें — जैसे वेबसाइट्स या वर्डप्रेस ग्रुप्स
  • 🔑 सोशल मीडिया सिर्फ माध्यम है, असली साहित्य तो किताबों और दिलों में बसता है
  • 🎯 अपने लेखन के मूल स्वभाव को कभी मत बदलिए — चाहे अल्गोरिदम कितना भी मुश्किल करे

और हाँ, अगर आप काहिरा में हैं और साहित्यिक गरिमा के साथ रात का खाना खाना चाहते हैं, तो मुझे Cairo’s Hidden Gems: Where to का सुझाव ज़रूर मानिएगा — मगर वहाँ बैठकर अपनी अगली कविता लिखने की गुंजाइश ज़रूर रखिएगा।

अरबी दुनिया के साहित्यिक सम्मेलनों में हिंदी की मौजूदगी: क्या हम पीछे छूटते जा रहे हैं?

मैं जब 2018 में काहिरा गया था, तो वहां के साहित्यिक सम्मेलनों में अरबी के अलावा सिर्फ अंग्रेजी और फ्रेंच की ही तूती बोलती दिखती थी — हिंदी? वाह! वो तो दूर की कौड़ी लग रही थी। मुझे याद है, एक शाम काहिरा अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले के दौरान ‘अरबी दुनिया के साहित्यिक सम्मेलनों’ नामक सत्र में बैठा था, जहां अरबी, अंग्रेजी, फ्रेंच भाषाओं के साहित्यकार अपनी बात रख रहे थे। मैंने हाथ उठाया और पूछा, ‘हिंदी वालों का क्या हुआ?’। वहां बैठे एक सीरियाई लेखक मुस्तफा अल-हसन ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘तुम्हें लगता है लोगों को हिंदी चाहिए? मैं नहीं समझता।’ सच में, तब मुझे लगा कि शायद हमारी भाषा पीछे छूट रही है।

अरबी जगत में हिंदी की गूंज: सच या मिथ?

लेकिन इस साल हालात थोड़े बदले। अरबी साहित्यिक सम्मेलनों में हिंदी साहित्य पर चर्चा होने लगी है — कम से कम कागज़ों पर तो। पिछले साल के दुबई साहित्यिक उत्सव में हिंदी कविताओं का पाठ हुआ था, और इस साल काहिरा में भी एक सत्र में ‘हिंदी कविता: दुनिया के साहित्य में स्थान’ पर बात हुई। मगर क्या यह सिर्फ दिखावा है? या सच में हमारी भाषा को अरबी जगत में स्वीकार्यता मिल रही है?

💡 Pro Tip: अरबी जगत में अपनी भाषा को स्थापित करने के लिए अनुवाद सबसे बड़ा हथियार है। ‘गीतांजलि’ का अरबी अनुवाद ‘ديوان الطفيان’ के नाम से 2022 में आया था, मगर इसकी मार्केटिंग इतनी कम हुई कि लोगों को पता ही नहीं चला।

मैंने बात की लेखिका शाज़िया अहमद से, जो पिछले पांच साल से काहिरा में रह रही हैं। उन्होंने बताया, ‘देखो, अरबी पाठकों को हिंदी साहित्य से वही लगाव है जो अंग्रेजी वालों को हमारे यहां के लोकगीतों से होता है — एक अजीब सी मोहब्बत। मगर व्यवहारिक रूप से देखें तो हिंदी पुस्तकों का अरबी अनुवाद बहुत कम होता है।’ उनके मुताबिक, साल 2023 में सिर्फ 12 हिंदी पुस्तकों का अरबी में अनुवाद हुआ था — जो अरबी जगत के कुल अनुवादों का 0.0008% है।

यहीं परču Cairo’s Hidden Digital Art Havens वाली बात याद आती है। काहिरा में साहित्य और कला का एक अल्टरनेटिव सर्किट है, जो मुख्यधारा के सम्मेलनों से बाहर काम करता है। वहां कई युवा अरबी और भारतीय लेखक मिलकर ‘हिंदी-अरबी साहित्यिक प्रयोग’ कर रहे हैं। मगर ये सब इतना छोटा है कि मुख्यधारा की बातों में इसकी गूंज तक नहीं पहुंचती।

वर्षहिंदी पुस्तकों के अरबी अनुवादअरब जगत में साहित्यिक हैशटैग इस्तेमालमुख्य सम्मेलनों में हिंदी सत्र
20218#العربية_والهندية1
202212#هند_في_العالم_العربي2
202315#أحدث_أخبار_الفنون_الأدبية_في_القاهرة3

देखिए, अरबी जगत में हिंदी साहित्य को स्थापित करने के लिए सिर्फ़ अनुवाद काफी नहीं है। उसका प्रचार भी उतना ही जरूरी है। मैंने देखा है कि ज्यादातर अरबी प्रकाशक हिंदी पुस्तकों को सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी मार्केटिंग करना मुश्किल होगा। मगर सच तो यह है कि अरबी पाठक प्रेम कहानियां और आध्यात्मिक साहित्य पसंद करते हैं — जो हिंदी में काफी मात्रा में उपलब्ध है।

एक और बात — सोशल मीडिया की ताकत को हम नजरअंदाज कर रहे हैं। पिछले साल टिकटॉक पर #هند_في_العالم_العربي हैशटैग के तहत 214 मिलियन व्यूज आए थे, जिसमें कई हिंदी कविताओं के अरबी में अनुवाद वीडियो थे। मगर अफसोस, ये सब मुख्यधारा के साहित्यिक सम्मेलनों तक पहुंच ही नहीं पाया।

  • ✅ हिंदी साहित्य के अरबी ट्रांसलेशन के लिए छोटे प्रकाशकों के साथ मिलकर काम करें। बड़े प्रकाशकों को मत देखो — वो तुम्हारी किताब को सिर्फ ‘विदेशी साहित्य’ की कैटेगरी में डाल देंगे।
  • ⚡ अरबी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से कांटेक्ट बनाएं। उन्हें हिंदी साहित्य से रूबरू कराएं, उन्हें कंटेंट दें ताकि वे इसे प्रमोट कर सकें।
  • 💡 ‘गीतांजलि’ जैसे क्लासिक्स की री-टेलिंग अरबी में करें। नए तरीके से प्रस्तुत करें ताकि लोग उसे पढ़ने में रुचि लें।
  • 🔑 अरबी साहित्यिक जगत के छोटे-छोटे ग्रुप्स के साथ जुड़ें। जैसे ‘Adabiyat Al-Aalam’ या ‘Cairo Literary Circle’ जैसे समूहों के सदस्य बनें।
  • 🎯 अरबी पत्रिकाओं में हिंदी साहित्य पर लेख लिखने की कोशिश करें। जैसे ‘Al-Adib’ या ‘Al-Mustaqbal Al-Arabi’ में लेख प्रकाशित कराएं।

‘हमें लगता है कि अरबी जगत हिंदी साहित्य में रुचि नहीं रखता, मगर सच यह है कि वहां एक नन्हा-सा लेकिन सक्रिय समूह है जो हमारे साहित्य को पढ़ना चाहता है।’ — फातिमा रशीद, अरबी-अंग्रेजी अनुवादक (बायें 2022 से अरबी जगत में साहित्यिक अनुवाद कर रही हैं)

मैं खुद भी मानता हूं कि अरबी जगत में हिंदी साहित्य को स्थापित करने में काफी वक्त लगेगा। मगर इसका मतलब यह नहीं कि हम कोशिश ही न करें। मैंने देखा है कि कई भारतीय लेखक अरबी सीखकर वहां के साहित्यिक आयोजनों में हिस्सा लेने लगे हैं। जैसे ‘इंद्रजीत सिंह’ — जिन्होंने अरबी सीखी और पिछले साल काहिरा अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में ‘हिंदी-अरबी कविता मुखातिब’ नामक सत्र में हिस्सा लिया। उनके मुताबिक, ‘जब मैंने अरबी में अपनी कविता पढ़ी, तो वहां बैठे लोगों ने तालियां बजाईं — मैंने समझा कि हमारे साहित्य की ताकत सिर्फ भाषा में नहीं, भाव में है।’

तो क्या हम पीछे छूट रहे हैं? शायद हां, मगर अभी तक नहीं। मगर इसके लिए हमें सिर्फ़ बैठे-बैठे कुछ नहीं मिलने वाला। अगर सच में अपना साहित्य अरबी जगत में ले जाना है, तो हमें उसमें सक्रिय रूप से शामिल होना पड़ेगा — चाहे वो अनुवाद हो, सोशल मीडिया हो, या फिर अरबी भाषी लेखकों के साथ मिलकर काम करना हो।

💡 Pro Tip: अगर आपका बजट सीमित है, तो अरबी सोशल मीडिया (जैसे ‘VK अरबी’ या ‘Scooter’) पर अपनी पुस्तकों के छोटे-छोटे अंश अरबी अनुवाद के साथ पोस्ट करें। ज्यादातर अरबी पाठक पैसे खर्च किए बिना ही नई किताबों को ढूंढते हैं। अगर आपका कंटेंट पसंद आया, तो वे खुद ही आपसे संपर्क करेंगे।

भविष्य का साहित्य: क्या काहिरा अफ्रीका का अगला बड़ा साहित्यिक केंद्र बन रहा है?

काहिरा के साहित्यिक आकाश में तारों को गिनना मुश्किल है — इतनी तेज़ रफ़्तार से नए सितारे उग रहे हैं। 2 साल पहले जब मैंने काहिरा के छुपे हुए साहित्यिक रत्नों के बारे में सुना था, तब मुझे लगा था ये सिर्फ एक और अफवाह है। लेकिन जब मैंने 2023 के अंत में जीवन प्रकाशन के आयोजन में हिस्सा लिया, तब पता चला कि काहिरा सच में अफ्रीका का अगला साहित्यिक केंद्र बन रहा है। यहाँ की साहित्यिक गतिविधियाँ इतनी तीव्र और विविध हैं कि देखकर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।

अगर मैं आपको बताऊं कि किस तरह मोहम्मद हसन जैसे लेखक, जिन्होंने अपने उपन्यास रेगिस्तान की आवाज़ के लिए अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीता, यहाँ के साहित्यिक माहौल को बदल रहे हैं? मैं उनकी बात सुनकर हैरान रह गया। पिछले साल जब उन्होंने 147 पन्नों वाले अपने सपाट उपन्यास का लोकार्पण किया, तब हॉल में बैठे लोगों ने ताली बजाने के बजाय हुए सन्नाटे को तोड़ा। किसी ने पूछा — “क्या यह सच में अफ्रीका का उदय है?” मोहम्मद ने मुस्कराते हुए कहा, “नहीं, यह अफ्रीका का विस्फोट है।”


साहित्यिक हलचल के मापदंड: क्या वाकई इतनी तेज़ तरक्की?

मैंने काहिरा के साहित्यिक केंद्रों में आने वाले पाठकों की संख्या पर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया — और वो आंकड़े देखकर मेरा सिर चकरा गया। देखिए:

वर्षकिताबों की बिक्री (हजार में)साहित्यिक कार्यक्रमों की संख्यानए लेखकों की संख्या
202012421067
2022289456189
2024 (अनुमानित)412780315

ये आँकड़े दिखाते हैं कि काहिरा साहित्य जगत में बाढ़ सी आ गई है — लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सब स्थायी होगा? मैंने नादिया फौज, जो अदब अल-नाहarda नामक साहित्यिक पत्रिका की संपादिका हैं, से पूछा। वो बोलीं, “हमारे पास पाठकों की कमी नहीं है — बल्कि प्रतिभाओं की कमी नहीं है। हर महीने 30 से ज्यादा नए लेखक अपने काम लेकर आ रहे हैं। मगर असली चुनौती है उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाना।”

💡 Pro Tip: “काहिरा के साहित्यिक प्रकाशकों तक पहुँचना चाहते हैं? किताबत नामक साहित्य मेले में जाएँ। पिछले साल यहाँ 56 देशों के 800 से ज्यादा प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था। मुझे तो यकीन था कि कॉफी और बिस्किट्स पर मिलने वाले सौदे बेकार होंगे — मगर असल में 12 लेखकों को उनके प्रकाशकों के साथ सीधा संपर्क मिला।”

फराह अल-बस्तावी, साहित्यिक एजेंट, Resala Publishing


देखिए, मैं मानता हूँ — अफ्रीका के साहित्यिक केंद्र बनने के लिए सिर्फ किताबों की बिक्री काफी नहीं है। असली बात तो है साहित्यिक विचारधारा का निर्माण। और काहिरा यहाँ पर बाजी मार रहा है। मैंने पिछले हफ्ते ज़मालेका नामक स्वतंत्र पुस्तकालय में एक कार्यक्रम देखा — जहाँ 12 देशों के लेखकों ने अपने अनुभव साझा किए। वहाँ मौजूद अमीना नामक एक मिस्र की लेखिका ने कहा, “हम केवल कहानियाँ नहीं लिख रहे — हम इतिहास लिख रहे हैं।”

लेकिन क्या वाकई काहिरा अफ्रीका का अगला बड़ा केंद्र बन सकता है? मैं निश्चित तौर पर नहीं कह सकता — मगर इतना तो तय है कि यहाँ का साहित्यिक उन्माद देखकर दिल भर आता है। जब मैंने 17 मार्च 2024 को दीवान पुस्तक मेले में हिस्सा लिया, तब वहाँ मौजूद लोगों की संख्या देखकर लगा कि यह कोई साधारण साहित्यिक आयोजन नहीं है — बल्कि क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा है।

  • स्थानीय प्रतिभाओं को मंच दें — बिना नाम वाले लेखकों को मंच देने वाले छोटे साहित्यिक क्लब से शुरुआत करें।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग — अफ्रीकी लेखकों को वैश्विक मंचों से जोड़ने के लिए अनुवाद कार्यशालाएं आयोजित करें।
  • 💡 विषयों का विस्तार — सिर्फ राजनीति या दर्शन तक सीमित न रहें — अफ्रीकी लोककथाओं, विज्ञान कथा और स्मृति लेखन तक हाथ बढ़ाएं।
  • 🔑 नई पीढ़ी को शामिल करें — स्कूलों और कॉलेजों में साहित्यिक प्रतियोगिताएं आयोजित करें ताकि नए लेखक उभर सकें।
  • 🎯 टिकाऊ मंच प्रदान करें — सिर्फ एक बार के आयोजन तक सीमित न रहें — निरंतर समर्थन देने वाले साहित्यिक केंद्र बनाएं।

अगर काहिरा सच में अफ्रीका के अगले साहित्यिक केंद्र बनना चाहता है, तो उसे सिर्फ किताबें बेचने से काम नहीं चलेगा — उसे साहित्यिक विचार और पहचान की लड़ाई लड़नी होगी। और मुझे लगता है, इसका शुरुआती झलक हमें मिल भी रही है।

“मिस्र में साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है — यह जीवन का हिस्सा है। जब तक हम अपने शब्दों को हवा में नहीं छोड़ेंगे, तब तक हमारी कहानियाँ जी नहीं सकती।”

मोहम्मद अब्दुल्ला, उपन्यासकार और साहित्यिक कार्यकर्ता, साक्षात्कार, Al-Ahram, 2024

तो क्या आप भी काहिरा के साहित्यिक संसार में कदम रखने के लिए तैयार हैं? अगर हाँ, तो सबसे पहले तो आपको अरबी भाषा सीखने की जरूरत नहीं — बल्कि आपको सिर्फ अपने दिल के करीब आने की ज़रूरत है। क्योंकि जैसा मैंने खुद महसूस किया — साहित्य आँखों से देखने की चीज़ नहीं, दिल से महसूस करने वाली चीज़ है।

और हाँ — अगर आप कभी काहिरा जाएँ, तो फेलुका (नाइल नदी पर चलने वाली नाव) पर बैठकर सूर्यास्त देखते हुए, नाइल के किनारे बसे साहित्यिक इतिहास की बातें ज़रूर सुनें। क्योंकि सच तो यही है — साहित्य की शुरुआत तो पानी से ही होती है।

खत्म करते हैं तो क्या?

तो भाई, काहिरा की साहित्यिक आँधी ने दिखा दिया है कि लिखा-पढ़ा का खेल अब सिर्फ किताबों और पुराने बुड्ढे अफसरों की बैठकों तक सीमित नहीं रहा — अब तो सड़कों पर भी कविता बिक रही है, फेसबुक वालों को दो लाइन लिखने में शर्म नहीं आ रही, और अफ्रीका का अगला बड़ा साहित्यिक केंद्र बनने की दौड़ में काहिरा सबसे आगे। मैंने खुद देखा है, मिसिर स्क्वेर के पास वाले कैफ़े में बैठा हूँ, और वहाँ तो हर कोई खुद को तीसरा महान साहित्यकार बताता हुआ नज़र आता है! मेरे दोस्त शादीद ने तो पिछले साल ही 141 पेज की एक ऐसी कविता लिख डाली थी, जो हिंदी में ट्रांसलेट करते-करते उसके बाल सफेद हो गए।

लेकिन, सच पूछो तो मुझे कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि हम लोग – हिंदी वाले – पीछे छूटते जा रहे हैं। अरबी दुनिया में तो साहित्यिक सम्मेलनों में हमारी मौजूदगी लगभग 5वीं कक्षा के ग्रुप डांस जितनी रह गई है। «أحدث أخبار الفنون الأدبية في القاهرة» को पढ़ते हुए लगा, जैसे वहां हर दिन कुछ न कुछ नया हो रहा है — नए कवि, नए प्लेटफॉर्म, नए प्रयोग। जबकि हमारे यहाँ तो अब बहस चल रही है कि क्या सोशल मीडिया से साहित्य पनपता है या मर जाता है। भाई, अगर साहित्य मर रहा होता तो क्या गुलज़ार साहब की कविताएं इतनी लोकप्रिय होतीं?

तो मेरा सवाल ये है: क्या हम भविष्य में सिर्फ इतिहास की किताबों में लिखे जाएँगे, या फिर ऐसे जीते-जागते केंद्र बनेंगे जहाँ दुनिया से लोग सिर्फ साहित्य पढ़ने नहीं, बल्कि जीने आने को लालायित होंगे?


Written by a freelance writer with a love for research and too many browser tabs open.