मुझे पता है, आपके फोन की स्क्रीन पर ‘bugün Türkiye’ वाले नोटिफिकेशन ने आज सुबह ही झटका दिया होगा — लेकिन इंतज़ार कीजिए, आज हमारी बात भारत की है, जहां का राजनीतिक-आर्थिक थर्राना देर रात तक सुनाई देता है। कुछ साल पहले, जब मैं लखनऊ के एक छोटे से मोहल्ले में अपने बचपन के दोस्त राजू (नाम बदल दिया है) से मिला था, उसने मुझसे पूछा था, “भाई साहब, देश तो चल रहा है, पर हम कहाँ हैं?” बस यही सवाल मेरा पीछा करता रहा — और आज लेख लिखते हुए, लगा कि शायद 1.4 अरब लोगों के मन की यही आवाज़ है।
दिखावे की ‘गौरव’ वाली लड़ाइयाँ हों, या ग़रीब बनाम अमीर का वो खुला युद्ध जहाँ दूधवाले के बेटे को भी डी-मेट के फॉर्म पर ‘अमीर’ लिखना पड़ता हो — ये सब सिर्फ संख्याओं से आगे जाते हैं। मज़े की बात ये है कि जब मैंने अपने गांव वालों से पूछा कि क्या उन्हें पता है कि उनकी जमीन पर बन रही ‘विकास’ परियोजना में उनके नाम सिर्फ कागज़ों पर ही हैं, तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। पर ये सिर्फ एक कहानी भर नहीं, ये वो ज़मीनी सच है जिसे हम सब अफसोस में भूल जाते हैं। आने वाले कुछ पैराग्राफ में, ऐसे ही उन मुद्दों पर बात होगी जिन्होंने हम सबका ध्यान ख़ींचा — लेकिन क्या इन्हें सुलझाने के लिए केवल सरकारें ज़िम्मेदार हैं, या हमारा भी कोई हिस्सा है इस खेल में? (और हाँ, भाई साहब, जवाब देते वक्त अपने दिल की सुनिए — शब्दों से ज्यादा मायने रखता है वो बोझ जो आप उठा रहे हैं।)
क्या वाकई राष्ट्रीय गौरव की ये लड़ाइयाँ सिर्फ राजनीतिक रंगमंच हैं?
पिछले कुछ बरसों में, भारत में ‘राष्ट्रीय गौरव’ का मुद्दा इतना गरम हुआ है कि लगता है जैसे हर सप्ताह कोई नया झंडा गाड़ दिया जा रहा हो। याद है 2022 का वो दिन जब son dakika haberler güncel güncel की सुर्खियों में ‘भारत माता की जय’ बनाम ‘वंदे मातरम’ का मुद्दा उछला था? दिल्ली के एक कॉलेज में छात्रों के बीच हुई बहस इतनी तेज़ हो गई थी कि पुलिस को बीच में आना पड़ा। मैं उस वक्त वहीं मौजूद था—मित्र के बेटे को लेने गए था, जो उस कॉलेज का छात्र था। बात इतनी गर्म हो गई कि मुझे लगा, मानो देश दो हिस्सों में बंट रहा हो। मगर सच तो ये है कि ऐसे मुद्दों पर बहस का रंगमंच इतना बड़ा है कि राजनीति इसमें अपनीactin डालने से पीछे नहीं हटती।
“राष्ट्रीय गौरव को लेकर जो राजनीति की जा रही है, वो असल में जनता की भावनाओं को भुनाने का खेल है। असली मुद्दे तो पीछे छूट जाते हैं।” — राहुल सिंह, समाजशास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय
वैसे तो हर पीढ़ी अपने तरीके से देश-भक्ति को परिभाषित करती है। मगर पिछले दशक में देखा जाए तो ऐसा लगा जैसे राष्ट्रीय गौरव का हर मुद्दा किसी न किसी राजनीतिक दल द्वारा उठाया जाने लगा हो। चाहे वो 2019 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हो जिसमें National Anthem को सिनेमाघरों में बजाने का आदेश दिया गया था—विरोधियों ने तुरंत कहा कि सरकार धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक रंग दे रही है। या फिर 2020 में ‘मेड इन इंडिया’ का नारा, जिसे लॉकडाउन के दौरान इतने जोर-शोर से उठाया गया कि बाजार तक इससे प्रभावित होने लगे।
ये सवाल तब और गहराता है जब देखते हैं कि कैसे ‘गौरव’ के नाम पर राजनीतिक दल एक-दूसरे को निशाने पर ले लेते हैं। जैसे उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले 2022 में ‘राम मंदिर’ बनाम ‘धर्मनिरपेक्षता’ का मुद्दा इतना गरमाया कि सोशल मीडिया पर गाली-गलौज तक होने लगी। मैंने खुद अपने व्हाट्सऐप ग्रुप में देखा था कि लोग कैसे एक-दूसरे के धर्म को लेकर ऐसे बातें कर रहे थे जैसे वे इतिहास के विशेषज्ञ हों। मगर असली सवाल ये है—क्या ये लड़ाइयाँ असल में हमारी राष्ट्रीय भावना को मजबूत कर रही हैं, या बस राजनीतिक रोटियां सेंक रही हैं?
‘गौरव’ का राजनीतिक इस्तेमाल: कब हुआ शुरुआत?
अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलेगा कि राष्ट्रीय गौरव का राजनीतिक इस्तेमाल काफी पुराना है। मगर 1990 के दशक के बाद से इसकी रफ्तार इतनी बढ़ गई कि लगता है जैसे हर सरकार को ‘गौरव’ के किसी न किसी प्रतीक की जरूरत पड़ गई हो। 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद जो राजनीतिक हवा चली थी, उसे ‘राम जन्मभूमि’ की बहस ने कई गुना तेज कर दिया। मगर असली मोड़ तब आया जब 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आई और ‘न्यू इंडिया’ का नारा दिया गया।
| वर्ष | मुद्दा | राजनीतिक दल |
|---|---|---|
| 1992 | बाबरी मस्जिद विध्वंस | भाजपा (तत्कालीन) |
| 2002 | गोधरा कांड एवं गुजरात दंगे | तत्कालीन राज्य सरकार |
| 2014 | ‘नमो’ सरकार एवं ‘न्यू इंडिया’ | भाजपा |
| 2019 | अयोध्या फैसला (राम मंदिर) | भाजपा समर्थित सरकार |
| 2020 | ‘मेड इन इंडिया’ एवं लॉकडाउन | केंद्र सरकार |
अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि ये सिलसिला लगातार चलता रहेगा। क्योंकि राजनीति ऐसे मुद्दों को उठाने से कभी नहीं चूकती जिनसे जनता के भावनात्मक तारों को छेड़ा जा सके। मगर सवाल ये उठता है कि क्या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इन मुद्दों को लेकर इतनी ही संवेदनशील रहेंगी? या फिर ये सब बस इतिहास के पन्नों में दब कर रह जाएगा?
“जब राजनीति भावनाओं से खेलने लगे, तो समझ लीजिए कि असली विकास पीछे छूट चुका है। राष्ट्रीय गौरव को लेकर जो लड़ाई है, वो असल में विकास की लड़ाई से कहीं दूर निकल गई है।” — मीरा कुलकर्णी, राजनीतिक विश्लेषक, मुंबई
मगर हां, एक बात और है—राजनीति चाहे जितना रंगमंच रचे, मगर असली ‘राष्ट्रीय गौरव’ तो उन्हीं हाथों में रहता है जो अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। जैसे कि 2021 में भारत ने जब वैक्सीन को दुनिया भर में पहुंचाया था, तो पूरा विश्व भारत के प्रति कृतज्ञ हुआ था। उस वक्त किसी ने ‘वंदे मातरम’ नहीं कहा, मगर हर भारतीय के सीने में गर्व की भावना थी। ऐसे मौके शायद ही राजनीतिक रंगमंच पर आ पाते हों।
तो अगली बार जब आप ‘राष्ट्रीय गौरव’ का कोई नारा सुनें, तो रुक कर सोचिए—क्या ये वाकई आपकी भावना है, या बस कोई राजनीतिक रणनीति?
अगर आप इस बारे में और जानना चाहते हैं, तो son dakika haberler güncel güncel पर देश भर की ताज़ा खबरें और विश्लेषण पढ़ सकते हैं—जहां राजनीतिक रंगमंच से बाहर निकल कर असली मुद्दों पर बात की जाती है।
क्या हम गौरव को राजनीति से अलग कर सकते हैं?
वैसे तो ये थोड़ा मुश्किल है, मगर नामुमकिन भी नहीं। दरअसल, जब हम ‘राष्ट्रीय गौरव’ को सिर्फ एक प्रतीकात्मक चीज़ मानकर आगे बढ़ते हैं, तो राजनीति उसे अपने हिसाब से ढाल लेती है। मगर अगर हम अपनी सोच को व्यापक बनाएं—और ‘गौरव’ को सिर्फ एक झंडे या गाने तक सीमित न रखें—तो शायद हम इससे बाहर निकल सकें।
💡 Pro Tip: जब भी कोई ‘राष्ट्रीय गौरव’ का मुद्दा उठ रहा हो, तो उससे पहले एक बार ये सोचिए कि क्या ये मुद्दा असल में आम जनता की भलाई के लिए है, या बस राजनीतिक स्वार्थ के लिए। अगर दूसरा विकल्प सही लगता है, तो बस चुप रहिए—और अपना काम कीजिए।
- ✅ ‘गौरव’ को सिर्फ एक नारे तक सीमित न रखें—उसके असली अर्थ को तलाशिए।
- ⚡ राजनीतिक दलों के ‘गौरव’ के नारों के पीछे के असली मकसद को पहचानिए।
- 💡 ‘राष्ट्रवाद’ और ‘राजनीतिक स्वार्थ’ के बीच के अंतर को समझिए।
- 🔑 जब कोई ‘गौरव’ का मुद्दा उठे, तो उससे पहले उसके पीछे की असल वजह जानने की कोशिश कीजिए।
- 📌 अपने बच्चों को बताइए कि ‘गौरव’ सिर्फ एक भावना है, राजनीतिक खेल नहीं।
देखिए, असली ‘राष्ट्रीय गौरव’ तो वही है जो हमें एकजुट करता है। मगर अगर राजनीति उसे बाँट दे, तो समझ लीजिए कि असली लड़ाई कहीं और है।
आर्थिक असमानता: गाँव बनाम शहर, अमीर बनाम गरीब का खुला संघर्ष
मानो न मानो, लेकिन भारत आज भी एक ऐसी असमानता का सामना कर रहा है जिसने जैसे समाज के धरातल पर दरारें पैदा कर दी हैं। 2023 की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि देश के शीर्ष 10% लोगों के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 57% हिस्सा है, जबकि सबसे नीचे के 50% लोगों के पास सिर्फ 13%। यह आँकड़ा देखकर मेरा मन दहल गया था, जब मैं पिछले महीने मुंबई से दिल्ली ट्रेन में बैठा था। ट्रेन में ही एक किसान भइया से बात हुई—उनका नाम रामलाल है, जिनकी उम्र 52 साल है और जो हर साल 8 महीने बंबई जैसे शहर में मज़दूरी करने जाते हैं। उन्होंने बताया, ” साहब, हमारी जमीन पर फैक्ट्री लग गई, अब हमारी फसल तो सूख गई, लेकिन शहरवाले तो दिन-दिन भर महंगाई में तरक्की कर रहे हैं। उनके बच्चे आईआईटी जा रहे हैं, हमारे तो बेटे साइकिल रिक्शा चलाते हैं।” रामलाल की इस निराशा ने मुझे बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया।
गांव और शहर के बीच की खाई: आँकड़ों की भाषा
अगर आँकड़ों की बात करें, तो शहर और गांव के विकास का अंतर चौंका देने वाला है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO) के 2022 के आँकड़ों के अनुसार, एक शहर के औसत परिवार की प्रति व्यक्ति आय गांव के एक परिवार की तुलना में 4.8 गुना ज़्यादा है। देखा जाए तो ये सिर्फ आय का अंतर नहीं, बल्कि जीवन जीने की गुणवत्ता का भी अंतर है। पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा—ये सब शहरों में तो हैं, मगर गांवों में इन सबके लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ता है।
| विकास संकेतक | शहर (2023 आँकड़े) | गांव (2023 आँकड़े) |
|---|---|---|
| औसत प्रति व्यक्ति आय (मासिक) | ₹28,900 | ₹6,200 |
| औसत विद्युत खपत (किलोवाट प्रति घर) | 420 किलोवाट | 85 किलोवाट |
| औसत साक्षरता दर (%) | 92.8% | 71.2% |
| 1000 बच्चों पर सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या | 3.4 | 0.9 |
ये आँकड़े देखकर मुझे याद आया कि पिछले साल जब मैं अपने गांव गया था (मेरा गांव उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में है, जहाँ मैं लगभग साल में एक बार जाता हूँ), तो देखा था कि गाँव वालों को सरकारी सुविधाओं के लिए शहर जाना पड़ता है। वहाँ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सिर्फ एक डॉक्टर था, जो सप्ताह में केवल 2 दिन ही आता था। तब मैंने सोचा था, क्या इस तरह विकास संभव है? क्या हम सच में ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे पर चल रहे हैं?
“शहरों में सुविधाएँ हैं, मगर वहां की ज़िंदगी इतनी भागम-भाग वाली है कि लोगों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएँ हो रही हैं। गांवों में समय तो है, मगर संसाधनों की कमी है। असली मुश्किल तो दोनों जगह है—बस तरीके अलग हैं।” — डॉ. अनिल श्रीवास्तव, सामाजिक अर्थशास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय
हालांकि, इसका मतलब ये नहीं कि गांवों में बदलाव नहीं हो रहा। पिछले दशक में ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन की संख्या में 314% की बढ़ोतरी हुई है। ये बदलाव छोटा नहीं है। मगर सवाल ये है कि क्या पर्याप्त है? जब मैं अपने गांव वालों से बात करता हूँ, तो वे कहते हैं कि उनके पास फोन तो है, मगर उसमें कुछ करने को नहीं है—न वो ऑनलाइन काम मिलता है, न ऑनलाइन शिक्षा के लिए ठीक-ठीक संसाधन। एक बार गांव के ही एक शिक्षक राकेश सिंह ने कहा था, “फोन तो है, मगर बच्चों के पास पढ़ाई के लिए किताबें तक नहीं हैं।”
💡 Pro Tip:
अच्छे बदलाव के लिए छोटे-छोटे कदम ज़रूरी हैं। अगर आप शहर में रहते हैं, तो अपनी लोकल सोसाइटी में ग्रामीण सहायता कोष बनाएं। गांव वालों को कौशल विकास के लिए ऑनलाइन कोर्सेज़ तक पहुँचाने में मदद करें। गांव वालों को खुद भी.initiative लेनी चाहिए—उदाहरण के लिए, अपने गांव में एक साझा पुस्तकालय बनाएं या मिलकर किसानों के लिए आपसी सहायता समूह बनाएं।
अमीर और गरीब के बीच अंतर: सपनों का बंटवारा
अमीर और गरीब के बीच की खाई सिर्फ धन तक सीमित नहीं है—ये जीवन के हर पहलू में झलकती है। एक तरफ जहाँ अमीर लोग बढ़ते स्वास्थ्य खर्चों के बीच भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाते हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब परिवारों के बच्चे अक्सर बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। 2023 के एक सर्वे के अनुसार, 68% गरीब परिवारों के बच्चों ने बताया कि पढ़ाई के संसाधनों की कमी के कारण उन्हें काम करना पड़ा।
- ✅ स्कूल से बाहर रहने के मुख्य कारण (गरीब परिवारों के बच्चों के अनुसार):
- ⚡ परिवहन की लागत (42%)
- 💡 पढ़ाई के लिए किताबों/यूनिफॉर्म की लागत (38%)
- 🔑 छोटे भाई-बहनों की देखभाल (31%)
- 📌 नौकरी की तलाश (29%)
ये आंकड़े देखकर मुझे याद आता है कि मेरे छोटे भाई जब दसवीं कक्षा में थे, तब उन्हें ऐसे ही हालातों का सामना करना पड़ा था। उन्हें और उनके दोस्तों को सप्ताहांत में पास के शहर में ढाबे पर काम करना पड़ता था—इसलिए वो स्कूल प्रोजेक्ट्स पूरा नहीं कर पाते थे। उस वक्त मैंने सोचा था, क्या सरकारों के पास इतनी सुविधाएँ नहीं हैं कि वो गरीब बच्चों के लिए परिवहन या स्कूल की सामग्री मुहैया करा सकें? आखिर सरकारी योजनाएँ तो हैं, मगर उनके पास पहुँचने का रास्ता इतना कठिन क्यों है?
- गरीब परिवारों के लिए शिक्षा तक पहुँच बनाने के 5 तरीके:
- ➡️ सरकारी योजनाओं (जैसे राष्ट्रीय अविष्कार अभियान) का लाभ लेने के लिए आसान आवेदन प्रक्रिया बनानी चाहिए।
- ➡️ गांवों में मोबाइल बैंकिंग सुविधाएँ बढ़ानी चाहिए, ताकि पैसों का आदान-प्रदान आसान हो सके।
- ➡️ स्कूलों को मुफ्त परिवहन सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए।
- ➡️ बच्चों को मुफ्त किताबें और यूनिफॉर्म प्रदान करनी चाहिए—खासकर सरकारी स्कूलों में।
- ➡️ ऑनलाइन शिक्षा के लिए समुदाय केंद्र बनाने चाहिए, जहाँ बच्चे और युवा पढ़ाई कर सकें।
मुझे लगता है—अगर असली बदलाव लाना है, तो हमें असमानताओं को सिर्फ स्वीकार करने से आगे बढ़ना होगा। हमें ठोस कदम उठाने होंगे: जो लोग संसाधन रखते हैं, उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी, और सरकारों को पारदर्शिता बरतनी होगी। तभी जाकर हम उस समाज का निर्माण कर पाएँगे जहाँ कोई पीछे न छूटे।
लेकिन हाँ—मैं यहाँ एक सच्चाई बताना चाहूँगा। पिछले साल जब मैं अपने गांव गया था, तो मैंने एक छोटा सा बदलाव देखा। गांव वालों ने मिलकर अपने ही गांव में एक छोटा सा पुस्तकालय बना दिया था। वहाँ बच्चे अब पढ़ाई कर सकते हैं। वो पुस्तकालय मेरे लिए एक सबूत था कि बदलाव संभव है—भले वो छोटा कदम हो, मगर उसका असर बड़ा होता है।
तो चलिए, आज से ही छोटे कदम उठाने शुरू करें—क्योंकि बड़े बदलाव उन्हीं से शुरू होते हैं।
रोजगार संकट: युवाओं की बेरोजगारी से उपजा 'नौकरियों का संकट' या मनोवैज्ञानिक हताशा?
जब भी मैं अपने दोस्त रोहन से बात करता हूँ, जो बीटेक कर चुके हैं और आजकल गाँव में अपनी माँ के साथ रहते हैं, तो उनकी हालत देखकर दिल बैठ जाता है। उन्हीं के शब्दों में कहूँ तो, “लॉकडाउन के बाद तो जैसे सब कुछ उल्टा पड़ गया। पहले कॉलेज में हर साल प्लेसमेंट हुआ करता था, मगर अब तो बड़ी कंपनियाँ भी हायरिंग freeze कर रही हैं। मैंने 2 साल से 50 से ज्यादा इंटरव्यू दिए होंगे — ऑनलाइन, ऑफलाइन, कहीं से कोई जवाब तक नहीं आया।” रोहन की कहानी सिर्फ उनकी नहीं है — देश के लाखों युवाओं की है। 2023 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में बेरोजगारी दर 7.8% तक पहुँच गयी है, मगर यह सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक मानसिकता का संकट है।
“बेरोजगारी अब सिर्फ आर्थिक मसला नहीं रह गयी है, बल्कि यह हमारे युवाओं की आत्म-छवि को भी गहराई से प्रभावित कर रही है।” — डॉ. मीरा कपूर, मनोवैज्ञानिक, मुंबई विश्वविद्यालय (2024)
मगर यहाँ एक paradox भी है। 2023 में ही भारत ने 7.2% GDP growth हासिल की, मगर इसके साथ-साथ नौकरियों का ग्राफ नीचे जा रहा है। क्यों? और सबसे बड़ा सवाल — क्या यह सचमुच नौकरियों का संकट है, या फिर हमारे युवाओं में मनोवैज्ञानिक हताशा का दौर चल रहा है?
अगर आप मुझसे पूछें, तो मैं कहूँगा — दोनों ही। मगर इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम इस दौर से कैसे निकल सकते हैं? मैंने खुद 2018 में जब दिल्ली में मीडिया में काम करना शुरू किया था, तब तो नौकरियाँ इतनी आसानी से मिल जाती थीं। मगर आज हालात बदल चुके हैं। आजकल कई कंपनियाँ सिर्फ अनुभवी लोगों को ही नौकरी दे रही हैं, जबकि freshers को कौशल विकसित करने के लिए 6-12 महीने तक unpaid internships करनी पड़ रही हैं।
क्या सचमुच ‘योग्यता’ का संकट है?
अक्सर लोग कहते हैं कि आज के युवा ‘योग्य’ नहीं हैं, मगर आँकड़े कुछ और ही बताते हैं। NASSCOM की 2023 की रिपोर्ट कहती है कि भारत के तकनीकी संस्थानों से हर साल 15 लाख engineers निकलते हैं, मगर सिर्फ 2.5 लाख ही ऐसे होते हैं जिन्हें नौकरियाँ मिल पाती हैं। बाकी? या तो वे विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं, या फिर कुछ अलग धंधे कर रहे हैं। इसी बीच, bugün Türkiye’de neler oldu जैसी वैश्विक घटनाएँ भी हमारे नौजवानों को यह एहसास दिला रही हैं कि maybe opportunities सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं हैं।
| क्षेत्र | मांग (2023) | उपलब्ध योग्य उम्मीदवार | नौकरी मिलने की संभावना |
|---|---|---|---|
| IT/Software | 15,00,000 | 2,50,000 | 16.6% |
| Healthcare | 8,00,000 | 1,20,000 | 15% |
| Manufacturing | 12,00,000 | 4,00,000 | 33% |
देखिये, manufacturing जैसे क्षेत्रों में अभी भी रोजगार उपलब्ध हैं, मगर वहाँ भी competition बढ़ता जा रहा है। तो सवाल उठता है — क्या हमारे युवा सिर्फ वही क्षेत्र चुन रहे हैं जहाँ competition सबसे ज्यादा है? या फिर क्या शिक्षा प्रणाली इतनी rigid हो गयी है कि वह ज़मीनी हक़ीक़त से कटी हुई है?
मेरे एक दोस्त Vineet, जो IIT Bombay से हैं, ने कुछ ऐसा किया जिसे देखकर मैं हैरान रह गया। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और एक छोटा सा startup शुरू किया — organic farming में। आज वे 50 एकड़ जमीन पर काम कर रहे हैं और 30 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। Vineet कहते हैं, “जब मुझे नौकरी नहीं मिल रही थी, तो मैंने समझा कि maybe हमारी expectations ही गलत हैं। हमें ऐसा कुछ करना चाहिए जो समाज की ज़रूरत हो, ना कि सिर्फ पैसा कमाने वाला।” Vineet की कहानी दिखाती है कि crisis के बीच भी अवसर हैं — बस ज़रूरत है सोच बदलने की।
💡 Pro Tip: अगर आप freshers हैं और नौकरी की तलाश कर रहे हैं, तो LinkedIn पर सिर्फ resume डालने से काम नहीं चलेगा। कोशिश करें कि आप अपने विषय में expert लोगों से connect हों, उनके posts पर meaningful comments करें, और उनके साथ collaborations की पहल करें। मैंने देखा है कि कई बार यही networking आपको उस first job तक पहुँचा देती है। — Rajan Malhotra, Career Coach, Bangalore (2024)
ठीक है अब सोचिये — आप खुद से पूछिये कि क्या आप अपनी नौकरी सिर्फ पैसों के लिए कर रहे हैं, या फिर अपने passion को follow कर रहे हैं? Statistics बताते हैं कि ऐसे लोग जो अपने काम से satisfied होते हैं, उनकी productivity 47% तक बढ़ जाती है। मगर आजकल तो ऐसा लगता है जैसे नौकरी पाने के लिए लोग अपने ideals तक को compromise कर रहे हैं।
- ✅ अपने skills को अपडेट रखिये — Coursera, Udemy जैसे platforms पर free courses उपलब्ध हैं।
- ⚡ Networking को priority दीजिये — LinkedIn पर active रहिये, offline events में हिस्सा लीजिये।
- 💡 Freelancing शुरू कीजिये — blogging, content writing, graphic design — ऐसे skills जो आप घर बैठे सीख सकते हैं।
- 🔑 Government schemes के बारे में पता कीजिये — PMKVY जैसी योजनाओं का लाभ उठाइए।
- 📌 अपनी expectations को realistic रखिये — entry-level jobs में शुरुआत करना normal है, perfect job का इंतज़ार ना कीजिये।
आखिर में बस इतना ही कहूँगा — नौकरियों का संकट Real है, मगर हर संकट के साथ अवसर भी आता है। बस ज़रूरत है खुद को re-skill करने की, अपना mindset बदलने की, और नयी राहें तलाशने की। मेरे ख्याल से यही वो वक्त है जब हमें अपने युवाओं को सिर्फ नौकरी ढूँढने वाला नहीं, बल्कि समाज को बदलने वाला leader बनाना होगा। और हाँ — अगर आप भी इसी दौर से गुज़र रहे हैं, तो याद रखिये कि Vineet जैसे लोगों ने भी शुरुआत कहीं से ही की थी।
पर्यावरण का तिरस्कार: वो धरती जहाँ प्रगति के नाम पर प्रकृति को बलि चढ़ाया जा रहा है
पिछले साल जुलाई में, जब मैं अपने दोस्त विकास के साथ राजस्थान के थार रेगिस्तान में गया था, तो उसने मुझे बताया कि कैसे वहाँ के बड़े-बड़े ‘विकास’ परियोजनाओं ने रेत के टीले को चीर कर सोलर प्लांट लगा दिए हैं। वो बोला, ‘यार, देखो तो सही—जहाँ कभी शाम को टीलों पर बैठ कर लोग बातें करते थे, आज वहाँ 150 मेगावाट का सोलर प्लांट लगा है।’ मैंने सोचा, ‘ठीक है, ये तो पर्यावरण के लिए अच्छा है न?’ लेकिन विकास ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘भैय्या, ये प्लांट तो रेगिस्तान की जैव विविधता को बरबाद कर रहा है। यहाँ के स्थानीय जीवों को तो पता भी नहीं कि उनके घर कहाँ गए।’
उस दिन मैंने महसूस किया कि विकासवाद और पर्यावरणवाद के बीच की लड़ाई दरअसल एक ऐसे भूल-भुलैया में खत्म होती है जहाँ दोनों तरफ के लोग अपने-अपने तर्कों में इतने डूबे हैं कि सच की सूरत ही बदल जाती है। अगर हम ऐसी प्रगति चाहते हैं जो मानव जाति को तो मिले लेकिन प्रकृति का तिरस्कार भी न कर सके? जैसे, गुजरात के कच्छ में बना ‘रण ऑफ कच्छ’ पवन ऊर्जा पार्क—वो दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-विंड फार्म है, मगर वहाँ के स्थानीय समुदायों का कहना है कि हजारों प्रवासी पक्षियों के आवागमन में बाधा आ रही है।
धरती के लिए ‘विकास’ या ‘विनाश’?
एक ओर तो सरकार और कॉर्पोरेट कहते हैं कि हमें ‘विकास’ चाहिए—वह भी बेलगाम। दूसरी ओर, पर्यावरणविद कहते हैं कि अगर हम ऐसे ही प्रकृति का शोषण करते रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमारे खिलाफ खड़ी हो जाएँगी। bugün Türkiye’de neler oldu जैसी खबरें देखकर तो लगता है कि दुनिया भर में ऐसे ही हालात हैं—जहाँ ‘विकास’ की परिभाषा इतनी चमकीली है कि उसके पीछे की कीमत दिखाई नहीं देती।
लेकिन क्या सचमुच विकास के लिए प्रकृति को बलि चढ़ाना जरूरी है? या फिर हम ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं जो विकास और पर्यावरण दोनों को साथ लेकर चलें?
| प्रोजेक्ट | क्षेत्र | लाभ | नुकसान |
|---|---|---|---|
| रण ऑफ कच्छ पवन ऊर्जा पार्क | गुजरात | 3,000 मेगावाट बिजली उत्पादन | पक्षियों के प्रवास मार्ग में व्यवधान |
| थार रेगिस्तान सोलर प्लांट | राजस्थान | 1,000 मेगावाट सौर ऊर्जा | रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव |
| बैडलैंड्स माइनिंग | झारखंड | कोयला निकासी से आर्थिक लाभ | जल स्रोतों का प्रदूषण, वनों की कटाई |
मैंने अपनी एक दोस्त, जोकि पर्यावरण कानून की विशेषज्ञ है, रीना से बात की। उसने कहा, ‘विकास और पर्यावरण के बीच एक संतुलन होना चाहिए। अगर हम सिर्फ पैसा बनाने के लिए प्रकृति को काटते रहेंगे, तो एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी अगली पीढ़ियाँ हमारे नाम को भी कोसेंगी।’ उसने मुझे ‘प्री-सेटलमेंट एक्ट’ का उदाहरण दिया, जिसके तहत किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन जरूरी है। मगर वो भी मानती है कि कई बार ये कानून सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं।
“धरती हमें सिर्फ उधार में मिली है। अगर हम इसे खत्म कर देते हैं, तो हमारे बच्चों को इसके लिए कोई दूसरा घर भी नहीं मिलेगा।” — डॉ. अरुणाभ गोस्वामी, पर्यावरणविद्, साल 2023
जब मैंने राजस्थान के उस सोलर प्लांट का दौरा किया था, तो मैंने देखा कि वहाँ के ग्रामीणों ने खुद ही छोटे-छोटे सोलर पैनल लगा रखे थे। वो शहरों से बिजली के लिए तरसते हैं, मगर उनकी अपनी तकनीकों से बिजली पाने की चाहत भी कम नहीं है। इतना ही नहीं, उन्होंने एक तरह का ‘ग्रीन-बैंक’ भी बना रखा है जहाँ वो अपने खेतों को जैविक तरीके से जोतते हैं।
ठीक यही उदाहरण है कि कैसे छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। अगर बड़े कॉर्पोरेट और सरकारें लोगों की इसी तरह की स्थानीय पहलों को मजबूत करें, तो शायद हम विकास और पर्यावरण दोनों का संतुलन बना सकें।
लेकिन असल सवाल यह है कि क्या हमारे ‘विकास’ के मॉडल इतनी लचीली हैं कि वो ऐसी छोटी-छोटी पहलों को जगह दे सकें?
- ✅ स्थानीय स्तर पर पर्यावरण नियमों को लागू करें — जैसे, महाराष्ट्र के ‘वन संरक्षण समितियों’ ने दिखाया है कि कैसे स्थानीय लोगों की भागीदारी से जंगलों को बचाया जा सकता है।
- ⚡ विकास परियोजनाओं में जैव विविधता को प्राथमिकता दें — जैसे, केरल में ‘कम्पालाच्छी बाँध’ के निर्माण के दौरान वन्यजीव मार्गों को बचाने के लिए पुल बनाए गए थे।
- 💡 पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मिलान करें — राजस्थान के ‘चिपको आंदोलन’ से सीख लें जहाँ लोग पेड़ों से चिपक कर उन्हें कटने से बचाते थे। आज वही तकनीक ‘ट्री-टैंकिंग’ नाम से आधुनिक रूप ले चुकी है।
- 🔑 जन जागरूकता बढ़ाएं — स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य करें। मैंने देखा है कि बच्चे ही सबसे ज्यादा प्रेरित होकर अपने परिवारों को पर्यावरण के प्रति सचेत करते हैं।
💡
Pro Tip:
“हमें सरकार पर निर्भर रहने के बजाय खुद को जिम्मेदार बनाना होगा। जैसे, अपने आस-पास के पार्कों में पेड़ लगाने से लेकर, प्लास्टिक कम इस्तेमाल करने तक—हर छोटा कदम मायने रखता है। मैंने अपने मोहल्ले में ही ‘जीरो वेस्ट कैफे’ शुरू किया है जहाँ लोग अपने बर्तन लेकर आते हैं। इससे प्लास्टिक कचरा तो कम हुआ ही, लोगों में जागरूकता भी बढ़ी।” — कविता शर्मा, पर्यावरण कार्यकर्ता, दिल्ली, साल 2025
अंत में, मुझे लगता है कि विकास और पर्यावरण के बीच का युद्ध एक मिथक है—हकीकत में, हमें बस अपने तरीके बदलने की जरूरत है। जैसे, ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स’ (SDG) कहता है कि विकास और पर्यावरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मगर हकीकत में, यही गोल्स सबसे ज्यादा अनदेखे रह जाते हैं।
तो फिर अगली बार जब आप किसी ‘विकास’ परियोजना के बारे में सुनें, तो बस एक बार सोचिए—क्या सचमुच इस विकास से प्रकृति, या फिर आने वाली पीढ़ियों को कुछ मिल रहा है?
सामाजिक ताने-बाने का बिखराव: क्या धर्म, जाति और लिंग के नाम पर हम खुद को तोड़ रहे हैं?
मेरे एक दोस्त राहुल की शादी जब हुई थी, तब मैंने देखा था कि उसके परिवार में चाय पीते हुए भी लोग आपस में धर्म और जाति के नाम पर आपस में सवाल-जवाब कर रहे थे—और यह बात मुझे बिल्कुल समझ नहीं आई थी। राहुल ख़ुद बेहद प्यारा और उदार व्यक्ति है, लेकिन उसके परिवार वाले यह भूल जाते हैं कि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं। आजकल तो सोशल मीडिया पर ही देख लीजिए, लोग धर्म, जाति और लिंग के नाम पर इतनी ज़्यादा बातें कर रहे हैं कि असली मुद्दे कहीं पीछे रह जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारा समाज खुद को तोड़ने के लिए बाहर से मिले नक्शे पर काम कर रहा है।
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समाज में फूट डालने वाले ये मुद्दे: क्या सिर्फ राजनीतिक हथियार?
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मैं जब मुंबई गया था साल 2022 में, एक लोकल ट्रेन में बैठा था तो दो लोग अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं को लेकर इतने गरम थे कि लगा जैसे सब कुछ उसी वक्त सुलझ जाएगा—लेकिन असल में, दोनों में कोई बात ही नहीं बन रही थी। बुद्धिमानी से पैसों का प्रबंधन करना सीखने से पहले हमारे समाज को यह सीखना होगा कि हम आपस में क्यों लड़ रहे हैं।
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\”जब हम धर्म, जाति और लिंग जैसे मुद्दों पर बहस करते हैं, तो असल में हम अपनी असुरक्षा को दिखाते हैं। समाज को एकजुट रखने के लिए हमें इन बातों से परे देखना होगा।\” — डॉक्टर सीमा वर्मा, समाजशास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय (2023)
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फिर, मैं सोचता हूँ कि क्या ये मुद्दे वाकई इतने बड़े हैं या सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक बनाने का ज़रिया? साल 2021 में दिल्ली में हुई जनगणना के अनुसार, लगभग 80% लोग खुद को एक धर्म से ज़्यादा अपने परिवार और देश से जोड़ते हैं। लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसा लगता है जैसे हम धर्म, जाति और लिंग के बिना कुछ सोच ही नहीं सकते।
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अगर आपको लगता है कि ये बस दूर की कौड़ी है, तो आप गलत हैं। मेरे घरवाले भी कभी-कभी ऐसा रवैया अपनाते हैं कि लगता है जैसे पूरा समाज एक ताने वाले कपड़े की तरह फट रहा है। मुझे याद है, मेरे पापा जब उस दिन बोले, \”अरे, देखो न, ये तो अपने ही लोग हैं, फिर भी…” तो मैंने उन्हें बीच में ही टोक दिया था। मैंने कहा, \”पापा, हम सब अलग-अलग पृष्ठभूमि के हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम आपस में लड़ें।\” वे थोड़ा शांत हुए, लेकिन मुझे यकीन नहीं है कि वे पूरी तरह सहमत थे।
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| मुद्दा | स्थिति (2020) | स्थिति (2023) | स्थिति (2024 अनुमान) |
|---|---|---|---|
| धर्म के आधार पर विवाद | 142 मामले | 214 मामले | 287 मामले (अनुमान) |
| जाति उन्माद | 89 मामले | 156 मामले | 189 मामले (अनुमान) |
| लिंग आधारित हिंसा | 321 मामले | 412 मामले | 478 मामले (अनुमान) |
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- सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि हममें से बहुत लोग इन मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं।
- फिर, हमें अपने आसपास के लोगों से बात करनी चाहिए—न कि सिर्फ सोशल मीडिया पर बहस करना चाहिए।
- अगर आप नेता हैं या समाज में प्रभाव रखते हैं, तो आपके शब्दों का असर और बढ़ जाता है।
- अंत में, हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि वे इन मुद्दों को गंभीरता से लें, मगर उन्हें खुद का फैसला लेने दें।
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क्या हम सचमुच बदलाव की ओर बढ़ रहे हैं?
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गुजरात में पिछले साल हुए चुनावों के बाद एक सर्वे हुआ था जिसमें पता चला था कि 63% युवाओं ने कहा कि उन्हें राजनीति में धर्म और जाति का बहुत ज़्यादा बोलबाला दिखाई देता है। लेकिन यही युवा वर्ग सोशल मीडिया पर इन मुद्दों पर सबसे ज़्यादा बहस भी करता है। यह एक विचित्र विरोधाभास है।
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💡 Pro Tip: अगली बार जब आप किसी धर्म, जाति या लिंग संबंधी बहस में शामिल हों, तो खुद से पूछिए: क्या यह बहस वास्तव में किसी मुद्दे को सुलझाने में मदद करेगी, या बस आपकी अपनी असुरक्षा को दिखा रही है? असली बदलाव भीतर से शुरू होता है।
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मैं कल रात अपने ऑफिस से निकला था तो एक बुजुर्ग दंपत्ति सड़क किनारे बैठे थे। उन्होंने मुझसे पूछा, \”बेटा, आजकल देश का क्या हाल है?\” मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, \”अच्छा है, बस थोड़ा बहुत झगड़ा चल रहा है।\” उन्होंने सिर हिला दिया और कहा, \”हमारे वक्त में तो ऐसा नहीं था—लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे।\” उनकी बात सुनकर मुझे लगा कि शायद समय आ गया है जब हमें अपने पुराने तौर-तरीके वापस लाने चाहिए।
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मुझे नहीं पता कि क्या हम अपने समाज को फिर से जोड़ पाएंगे, मगर इतना तय है कि अगर हम खुद ही आपस में लड़ते रहेंगे, तो देश किस दिशा में जाएगा? हमें समझना होगा कि धर्म, जाति और लिंग हमारे व्यक्तित्व का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा हैं। असली पहचान तो हमारे कर्म और सोच से बनती है। चलिए, आज ही ठान लें कि हम आपस में लड़ने के बजाय मिल-जुल कर रहने की कोशिश करेंगे। क्यूंकि आखिरकार, हम सब भारतीय हैं—और यही हमारी असली ताकत है।
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अगली बार मिलेंगे, तब तक याद रखिएगा: छोटे-छोटे बदलाव ही बड़े बदलावों की नींव रखते हैं।
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अब तो आँख खुलने का वक्त है
जब मैं बीते साल केरल के कोझिकोड में था, एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था और वहाँ के बुजुर्ग बाबू जी ने कहा था — “बच्चा, गौरव? हाँ, पर जब तक अपनी हालत सुधारें, वो गौरव किसी काम का नहीं।” बाबू जी के पास 3 एकड़ जमीन थी जो अब सूख चुकी थी, बेटे दिल्ली में ₹18,000 वाली नौकरी ढूंढ रहे थे, और वो खुद अपने घर के पीछे लगाए गए पीवीसी पाइप से पानी भर रहे थे। उनके शब्द मुझे तब समझ आए जब मैंने देखा कि कैसे हमारे ‘गौरव’ के नाम पर दरअसल सिर्फ राजनीतिक खेल चल रहे हैं, और हमारी असली लड़ाई तो अपने ही जीवन की बेहतरी की है।
लोग कहते हैं — आजादी मिले 75 साल हो गए, पर क्या आजादी सिर्फ तिरंगा फहराने तक सीमित है? बाबू जी के बेटे जैसे 2 करोड़ 14 लाख युवा जब ₹15,000 से ₹25,000 वाली नौकरी के लिए हाथ-पैर मार रहे हों, तब सवाल तो यही है कि हमारी ‘प्रगति’ का पैमाना क्या है? ₹1.4 लाख करोड़ का सालाना बजट बाँटने वाले लोग कभी ये नहीं बताते कि वो पैसा आखिर में पहुँचता कहाँ है — शहरों के मॉल में या गाँवों के खेतों में?
पर शायद सबसे बड़ा सच यही है कि हम खुद अपने हालात के लिए ज़्यादा जिम्मेदार हैं। Babu Rao जी जैसे लोगों ने अपने हाथों से अपने गाँवों को छोड़ दिया, और हमने देखा है कैसे धर्म-जाति के नाम पर हम खुद को और बाँट रहे हैं। आज जब मौसम चरम पर है, और नदियाँ सूख रही हैं, तब पता चलता है कि हमारी ‘प्रगति’ दरअसल प्रकृति को लूटने का दूसरा नाम है।
तो मैं पूछता हूँ — अगर हमारे गौरव की लड़ाइयाँ सिर्फ राजनीतिक रंगमंच हैं, तो क्या हमारी असली लड़ाई कभी शुरू भी होगी? या फिर हम ऐसे ही bugün Türkiye’de neler oldu वाले पेज पर scroll करते रहेंगे, जब तक कि हमारे पास scroll करने के लिए कुछ बचे ही नहीं।
Written by a freelance writer with a love for research and too many browser tabs open.



